...कि रजिया गुंड़ों में फस गई!


मधुर आवाज के धनी हमारे मित्र ने अजीबो-गरीब गाना गुनगुनाना शुरू किया। जिसके वोल कुछ इस तरह के थे.... के रजिया गुंडों में फस गई...। सभी मित्रों ने प्रकृति के अंचल में कुछ पल सुकून के गुजारने का मन बनाया था। प्रोग्राम बनते-बनते दाल बाटियों पर जा टिका। लेकिन व्यवस्था को देखते हुये तीन-चार जगह अगीठी (आग) लगाई गई मतलब जलाई गई। तीन-चार जगह अगीठी जलती देख हमारे मित्र जो बडे मजाकिया हैं, भाव-भंगिमायें बदलते हुये बोले, अरे कमबख्तो... तुम सब ने हमारी दाल-बाटियों की आग ऐसे दूर-दूर जला दी। जैसे मप्र, राजस्थान और कर्नाटक में खिचड़ी पकनी हो। फिर बोले जब आग लगी ही दी है तो इसे जलने दो, फफक-फफक के जले,  भभक-भभक के जले.. होली का दहन के जैसी मचल-मचल के जले..., जल रही आग में बुराई को जलने दो। तभी हमारे सीधे-साधे दिखने बाले एक और मित्र बड़ी मासूमियत से बोले, भैया रेडियो में एक समाचार आ रहा है कि कुछ लोग कहीं चले गये हैं। लेकिन दूसरी तरफ के लोग मानने को तैयार ही नहीं हैं। कह रहे हैं, उनको उठा ले गये हैं। भैया बताओ तो जरा.. जिन को ले गये हैं, वो वेचारे दुधमुहे थे क्या? सभी ने मित्र की मासूमियत पर ठहाका मारा! सब की हँसी देख वे चुपचाप अपना चशमा सरकाते हुये दरी पर जा बैठ और अचानक फिर खडे हो गये।  बुंदेलखंडी में बोले अब जे तो बताई दो कि झूठो बड़ो के लवरा? किसे से कुछ जबाव मिलता न देख वे फिर से बैठ गये। हम सब खाना पकाने और गाना सुनने में मस्त थे। हमारे मधुर आवाज के धनी मित्र रजिया गुंडों में फस गई... गुन-गुना रहे थे। जिसके आगे के बोल थे, कर गया चार सौ बीसी तुझको देख के दिल ये, जालिम तीन सौ पैसठ दिन में एक दिन तो तू मिल ले, अल्लाह बचाएं मेरी जान के रजिया गुंडों में फस गई....। उतरा नहीं अब तक जहर, मैं इस तरह से डंस गई, अल्लाह बचाएं मेरी जान के रजिया गुंडों में फस गई... इसको ना सोने देंगे, किसी का ना होने देंगे कहीं का ना छोड़ेंगे इसे... हां आहें भी ना भरने देंगे, उफ़ भी ना करने देंगे...। इस गाने को सुनकर हमारे एक राजनैतिक जानकार और विशलेषक मित्र बैगन भर्ता बनाते हुये धीरे से बोले कसम से.. ये तो बिलकुल फिट हो रहा है, सभी चौके! वे वोले आजकल अपने प्रदेश की राजनीति में भी कुछ इसी तरह विसात जमी है। पांसे फेक रहे हैं और गोटियां निपटाईं जा रही हैं। पांसे फेफने से पहले सब चिल्ला रहे थे मामा 22-22, लेकिन 6 नंबर ही आ पाये। फिर सब के सब चिल्ला रहे थे मामा 16, मामा 16-16, और जे आ गये 16।  इसी के साथ सुना है धरती की जांच होनी है। हम ने पूछा भाई ये क्या बड़-बड़ा रहे हो, वे वोले हम समझने की कोशिश कर रहे हैं। जैसे इस वक्त पैंच फसा है....? और फूल भाई कह रहे हैं, इसको ना सोने देंगे किसी का ना होने देंगे, कहीं का ना छोड़ेंगे.... हां आहें भी ना भरने देंगे, उफ़ भी ना करने देंगे....? अब चौसर का खेल खेला जा रहा था सो गुस्सा आना लाजमी है। देखते है मुंह फुलाकर हम नहीं खेलते का जुमला कहकर खेल छोड़कर जाते हैं या गोटियां बिखराकर न खेलेंगे न खेलने देंगे की नीती आनाई जाती है।  खबर फैली है कि किसी ने मामा को कहते सुना है कि अब तेरा क्या होगा...? उसी समय कहीं पर कबीरदास जी का दोह बजने लगा ...बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।


अमित कृष्ण श्रीवास्तव


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