भारत भारती के माध्यम से राष्ट्रीयता का नवजागरण, मैथिलीशरण गुप्त ने राष्ट्रीयता को सर्वोपरि माना - श्रीराम माहेश्वरी
( जयंती 3 अगस्त पर विशेष )
राष्ट्रीयता की भावना जगाने के लिए भारत में कई साहित्यकारों ने अपना अमूल्य योगदान दिया। विश्व बंधुत्व बढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति की महत्ता को दुनिया के सामने रखा। अपनी कविता के माध्यम से भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से लोगों को परिचित कराया। इस योगदान के लिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। वे महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के विशेष कवि थे। गुप्त जी ने अपनी कृति "भारत भारती" के माध्यम से देश में राष्ट्रीयता की अलख जगाई और लोगों को आत्म सम्मान, साहस, बलिदान तथा संघर्ष के लिए प्रेरित किया। उनकी काव्य ध्वनि की गूंज सारे देश में वायु प्रवाह की गति से फैली।
भारतवर्ष की श्रेष्ठता की झलक उनकी कविता में मिलती है_
"भू लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगा जल जहां?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि में है, वह कौन? भारतवर्ष !"
इन उज्जवल और पवित्र शब्दों से कवि हिमालय और गंगाजल का परिचय देते हैं। समूचे भूलोक में इस पावन धरा की वे स्तुति गान करते हैं। प्रकृति को मां मानने वाले रचनाकार सच में भारत के सच्चे सपूत हैं। अन्य कुछ देशों में जहां राज्य की सीमा को मात्र भूमि का टुकड़ा मानते हैं, वहीं हम भारत को मातृभूमि मानते हैं। वस्तुतः प्रकृति और मातृभूमि के प्रति आदर, त्याग और समर्पण की भावना रखने वाले नागरिक ही उस राष्ट्र को महान बनाते हैं। इस भावना का जागरण देश के महान रचनाकार करते हैं। इसी क्रम में श्री गुप्त जी के काव्य का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान है।
भारत जब स्वतंत्र होने के लिए छटपटा रहा था और विदेशी शासन का नागरिकों पर शोषण लगातार बढ़ रहा था, वह दौर अन्याय का काला अध्याय ही कहा जाएगा। ऐसे समय श्री गुप्त जी ने विद्रोही तेवर दिखाए। अपनी कविताओं में आक्रोश के बीज बोए। संघर्ष का नवजागरण किया। उन्होंने अपनी कविताओं में ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं के पात्रों को चुना। इन पात्रों की छवि पहले से ही जनमानस की स्मृति में थी, इसलिए जल्दी ही उनमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की भावना पैदा हुई। गुप्त जी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। उनकी रचनाओं में आक्रामक तेवर नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य लोगों को राष्ट्रवाद की ओर प्रेरित करना रहा। लोग अन्याय के विरुद्ध खड़े हों और आंदोलन के माध्यम से समाज में जागृति आए। इस उद्देश्य से उनकी काव्य गूंज सफल रही।
गुप्तजी कहते हैं_
"हे भाइयों, सोए बहुत अब तो उठो जागो, अहो।
देखो जरा अपनी दशा आलस्य को त्यागो, अहो ।"
स्वदेश संगीत की पंक्तियां हैं_
"धरती हिल कर नींद भगा दे
वज्र नाद से व्योम जगा दे
दैव, और कुछ लाग लगा दे !"
यहां कविता में देव से प्रार्थना की गई है। श्री गुप्त जी ने माना कि यदि किसी की जाति का अतीत गौरवपूर्ण हो और वह उस पर अभिमान कर सके, तो उसका भविष्य भी गौरवपूर्ण हो सकता है। वे कहते हैं कि आत्म विस्मृति ही अवनति का विशेष कारण है, जबकि उन्नति का आधार आत्म स्मृति ही है। भारत के अतीत का गौरव गान करते हुए श्री गुप्त जी लिखते हैं_
"वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते न थे।
वे स्वार्थरत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे ।
तथा फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में।"
कविताओं के माध्यम से उन्होंने गुलामी की मानसिकता और लोगों की उदासीनता के अंधेरे को हटाने का प्रबल प्रयास किया। छुआछूत की भावना के विरुद्ध भी उन्होंने लिखा_
"मंदिर का द्वार जो खुलेगा सबके लिए
होगी तभी मेरी वहां विश्वंभर भावना। "
उन्होंने यहां वर्णभेद की भावना से लोगों को ऊपर उठने का संदेश दिया। वे धार्मिक एकता के प्रबल पक्षधर थे । उनका मानना है कि धर्म राष्ट्रीय एकता और विश्व बंधुत्व में बाधक नहीं है। धर्म का उद्देश्य विश्व बंधुत्व को बढ़ाने के लिए होना चाहिए। यहां हम कह सकते हैं कि मैथिलीशरण गुप्त जी ने देश की स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीयता की विचारधारा को बखूबी आगे बढ़ाया। अपने विद्रोही स्वर को पंख दिए। उनकी काव्य स्वरों की गूंज स्वतंत्रता आंदोलन में संजीवनी बनी।
राष्ट्र के विकास में उनका रचनाधर्म मील का पत्थर बना। उनके शब्दों ने ही उन्हें ऊंचा उठाया, इसीलिए सारा देश द्विवेदी युग के इस यशश्वी रचनाकार को श्रेष्ठ और महान कवि मानता है। श्री गुप्त जी अपने जीवन के अनुभवों और अनुभूतियों को कविता में उतारा। परतंत्र देश में प्रजा पर होने वाले अन्याय के प्रति उनकी संवेदना शब्दों में उभरी। वैचारिक संघर्ष को उन्होंने नई दिशा दी। अहिंसक आंदोलन की प्रेरणा उनकी कविताओं की प्राणवायु है। मूल आधार है। उन्होंने प्रकृति को निहारते हुए हिमालय, नदियां और पेड़-पौधों को निमित्त बनाकर कवित्त रचा। इससे स्पष्ट है कि वे प्रकृति प्रेमी थे। अन्य कवियों की किसी विचारधारा के प्रवाह में वे नहीं बहे। उन्होंने अपनी एक अलग धारा बनाई। राष्ट्रवाद का मार्ग चुना और दूसरों को भी सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया।
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को झांसी के पास चिरगांव में हुआ था। उनके पिता सेठ रामचरण थे। माता का नाम श्रीमती काशी बाई था। बचपन में उनके पिता ने उन्हें कविता सुनाई थी। आगे चलकर यह बीज उनके जीवन में अंकुरित हुआ और वे राष्ट्र कवि बने।
राष्ट्रधर्म की अटूट निष्ठा के कारण ही वे शीर्ष पर स्थापित हुए। उनके मार्ग में अनेक विघ्न आए, परंतु वह अपने लक्ष्य से डिगे नहीं, अडिग रहे। इन्हीं विशेषताओं के चलते उनका रचनाकर्म लोकप्रिय हुआ। साहित्य के मानसरोवर में ऐसे श्रेष्ठ कवि का कर्म और धर्म अविस्मरणीय है, जिन्होंने राष्ट्रीयता को सर्वोपरि माना।
( लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं )।
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